रैयतवाड़ी की प्रमुख विशेषताएं क्या थी?

उत्तर- कृषकों के साथ प्रत्यक्ष रूप से व्यक्तिगत भू-राजस्व समझौते को रैय्यतवाड़ी व्यवस्था कहा गया। इसके अंतर्गत प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूस्वामी स्वीकार किया गया एवं भू- राजस्व जमा कराने का दायित्व प्रत्यक्ष रूप से कृषकों को सौंपा गया। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य कंपनी व कृषकों के मध्य के बिचौलिए वर्ग (जमींदार) को समाप्त करना था। अंग्रेज अधिकारी थॉमस मुनरो व कर्नल रीड को रैय्यतवाड़ी व्यवस्था का जनक माना जाता है ।1793 ई.में यह व्यवस्था कर्नल रीड द्वारा बारामहल जिले में लागू की गई थी। रैय्यतवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत ब्रिटिश भू-भाग का 51% हिस्सा शामिल किया गया। रैय्यतवाड़ी व्यवस्था को 30 वर्ष के लिए लागू किया गया व इसकी दर 1/3 निर्धारित की गयी थी।

विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन किसने किया?

Ans: विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन रामानुजाचार्य ने किया. रामानुजाचार्य (1017- 1137 ई.) वेदांत शिक्षा, रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी आलवार संतो के अतिरिक्त दक्षिण के पंचरात्र परम्परा से प्रभावित थे। रामानुज सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे तथा भक्ति मार्ग को मोक्ष का साधन मानते थे। इन्होंने ‘विशिष्टाद्वैत दर्शन ‘का प्रतिपादन किया तथा वैष्णव धर्म को एक दार्शनिक आधार प्रदान किया। रामानुज का ‘विशिष्टाद्वैत’ दर्शन शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। रामानुज के अनुसार ब्रह्मा ,जीव तथा जगत तीनों में एक विशिष्ट संबंध है तथा तीनों सत्य है। रामानुज ईश्वर में व्यक्तित्व की प्रधानता को स्वीकार करते थे। रामानुजाचार्य का सम्प्रदाय ‘श्री वैष्णव ‘ सम्प्रदाय कहलाता है। वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर, रैदास और सूरदास थे।

रामानुजाचार्य ने किस दर्शन का प्रतिपादन किया?

(A) अद्वैतवाद
(B) शुद्धाद्वैतवाद
(C) विशिष्टाद्वैतवाद
(D) द्वैतवाद

Ans: (C) विशिष्टाद्वैतवाद

रामानुजाचार्य (1017- 1137 ई.) वेदांत शिक्षा, रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी आलवार संतो के अतिरिक्त दक्षिण के पंचरात्र परम्परा से प्रभावित थे। रामानुज सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे तथा भक्ति मार्ग को मोक्ष का साधन मानते थे। इन्होंने ‘विशिष्टाद्वैत दर्शन ‘का प्रतिपादन किया तथा वैष्णव धर्म को एक दार्शनिक आधार प्रदान किया। रामानुज का ‘विशिष्टाद्वैत’ दर्शन शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। रामानुज के अनुसार ब्रह्मा ,जीव तथा जगत तीनों में एक विशिष्ट संबंध है तथा तीनों सत्य है। रामानुज ईश्वर में व्यक्तित्व की प्रधानता को स्वीकार करते थे। रामानुजाचार्य का सम्प्रदाय ‘श्री वैष्णव ‘ सम्प्रदाय कहलाता है। वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर, रैदास और सूरदास थे।

स्थायी बंदोबस्त के गुण और दोष

उत्तर- स्थायी बंदोबस्त भू-राजस्व व्यवस्था में विभिन्न दोष थे। जिनके दूरगामी परिणाम देखने को मिले। इससे जमींदारों का किसान पर शोषण बढ़ा , भूमि की नीलामी के कारण भूमि ‘उपसामंतीकरण’ होने लगा, सूर्यास्त के नियम के कारण दूरवासी या अनुपस्थित जमींदारी का उदय हुआ, कृषकों की स्थिति अब ‘कृषक दास’जैसी हो गई थी।

जमींदारों को इस व्यवस्था से सर्वाधिक लाभ हुआ क्योंकि इसके माध्यम से भूमि पर उनका वास्तविक स्वामित्व स्वीकार कर लिया गया तथा भू-स्वामित्व परंपरागत हो गया। अंग्रेजों को जमींदारों के रूप में एक सामाजिक मित्र मिल गया। जिसका अंग्रेजों से सहजीवी संबंध बन गया, कालांतर में यह वर्ग अंग्रेजों के विरुद्ध हुए विद्रोह हो से भी पृथक रहा।

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांतों की विवेचना कीजिए?

उत्तर बौद्ध धर्म ने भारतीय चिंतन एवं नैतिक जीवन को अत्यधिक उन्नत किया ।बौद्ध धर्म की ‘संघ प्रणाली’ ने सामूहिक निवास की परंपरा द्वारा ‘सामाजिक समागम’ की प्रणाली का विकास किया। बौद्ध भिक्षुओं की निस्वार्थ धर्म प्रसार की भावना तथा जन कष्ट निवारण के उपायों ने भारतीय समाज में निस्वार्थ भाव और नैतिक धर्म का प्रारंभ किया। बौद्ध धर्म ने भारतीय दर्शन में ‘तर्कवाद’ का प्रसार करते हुए चिंतन की स्वतंत्रता पर बल दिया। बौद्ध धर्म के शून्यवाद व विज्ञानवाद का प्रभाव ना केवल कुमारिल भट्ट व शंकराचार्य (प्रच्छन्न बौद्ध) पर ही पड़ा बल्कि इसने वैश्विक चिन्तन को भी प्रभावित किया।

बौद्ध धर्म ने अपने अहिंसा और प्राणियों के प्रति दया भाव से ना केवल सामान्य जन को ही प्रभावित किया वरन बड़े-बड़े शासकों ने इस भाव से प्रभावित होकर अपने संपूर्ण जीवन को ही परिवर्तित कर लिया(अशोक की धम्म नीति)। बौद्ध दर्शन ने नैतिक जीवन एवं सदाचार को उच्चता प्रदान की तथा परोपकार, त्याग सत्चरित्रता और अहिंसा, सहनशीलता, सह अस्तित्व आदि गुणों का जन प्रचार कर, जनमानस में इसकी मान्यता स्थापित की।

बौद्ध धर्म ने आडंबर हीन एवं सरल व सुबोध सिद्धांत वाला धर्म दिया। जिसमें कर्मकाण्डों, मूर्तिपूजा, बलि प्रथा, वर्णाश्रम व्यवस्था आदि का अभाव था। सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु जाति प्रथा के कठोर बंधनो का निषेध कर जन्म के स्थान पर ‘कर्म की मान्यता’ स्थापित की और मानव को कर्तव्य का महत्व दर्शाया।

बौद्ध धर्म ने मोक्ष प्राप्ति के लिए भारतीय दर्शन एवं चिंतन को ‘मध्यम मार्ग ‘दिया जो बाद में विश्व का लोकप्रिय चिंतन बन गया। विभिन्न राष्ट्रों में बौद्ध धर्म का प्रसार होने से । भारत का ऐतिहासिक काल से इन राष्ट्रों से मधुर संबंध तो थे ही साथ ही वर्तमान समय में भी ‘द्विपक्षीय संबंधों’ को सुधारने में ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया जाता है।

भारतीय संविधान की पांच विशेषताएं बताइए?

भारतीय संविधान बहुत बड़ा तथा व्यापक है. भारतीय संविधान की पांच विशेषताएं का वर्णन किया है.

(i) विश्व का विशालतम संविधान

(ii) शक्तियों का विभाजन- a. केन्द्र सूची b. राज्य सूची तथा c. समवर्ती सूची

(iii) प्रशासनिक क्रियाकलाप का उल्लेख

(iv) लिखित संविधान (संविधान की सर्वोच्चता)

(v) कठोर व नम्य (लचीला) का समन्वय

(Vi) स्वतंत्र न्यायपालिका

(vii) मौलिक अधिकार

(viii) नीति निर्देशत तत्व

(xi) मूल कर्तव्य

(x) प्रस्तावना (उद्देश्य)

(xi) संसदात्मक शासन व्यवस्था

(xii) सामान्य परिस्थितियों में संघात्मक किन्तु विशेष परिस्थितियों में एकात्मक शासन व्यवस्था ।

(xiii) इकहरी नागरिकता इत्यादि।

भारतीय संविधान में आधारभूत ढांचे को समझाइए?

उत्तर- संविधान के आधारभूत ढांचे की अवधारणा का आशय है कि कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं संविधान का मूल स्वरूप या भावना निर्मित करते हैं।केशवानंद भारती वाद (24 अप्रैल 1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने आधारभूत ढांचे के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।

संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्रात्मक संसदीय प्रणाली, शक्तियों का पृथक्करण, संघात्मक शासन व्यवस्था,विधि का शासन, पंथनिरपेक्षता, राष्ट्र की एकता एवं अखंडता ,निष्पक्ष चुनाव प्रणाली, व्यक्ति की स्वतंत्रता ,मौलिक अधिकार ,न्यायिक स्वतंत्रता आदि विषय आधारभूत ढांचे में सम्मिलित है।

मिनर्वा मिल्स वाद (1980) तथा एस.आर .बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के आधारभूत ढांचे का निर्धारण किसी वाद में किसी तत्व को तथ्यों के आधार पर किया जाएगा। अतः आधारभूत ढांचे के सिद्धांत द्वारा संविधान के निरंतर और असीमित संशोधन (अनुच्छेद 368) पर एक स्वाभाविक प्रतिबंध आरोपित होता है। जो न्यायिक पुनरावलोकन का ठोस आधार निर्मित करता है।

भारतीय संविधान में संशोधन प्रक्रिया क्या है?

उत्तर- भारतीय संविधान विश्व का सर्वाधिक विस्तृत एवं लिखित संविधान हैं । साथ इसकी विशेषता यह है कि इसमें नम्यता और अनम्यता दोनों का अद्भुत मिश्रण है | संविधान के भाग -20 के अंतर्गत अनुच्छेद- 368 में भारतीय संसद को ( विशेष बहुमत व आधे राज्यों विधानमण्डलों के अनुसमर्थन से ) संविधान संशोधन की शक्ति प्राप्त है।

भारतीय संविधान में संशोधन तीन प्रकार की प्रक्रिया से किया जाता है साधारण बहुमत से किए जाने वाली संशोधन विधि में संसद के दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधे से अधिक की सहमति आवश्यक है जैसे -अनुच्छेद 2,3,4, 75,97,100 ,105(3), 106 ,169 293 (अ) आदि में परिवर्तन ऐसे उपबंधों का संशोधन अनुच्छेद368 के अंतर्गत नहीं आता है।

विशेष बहुमत से संशोधन के अंतर्गत ‘संघीय ढांचे’से संबंधित विषयों को छोड़कर अन्य जैसे -मूल अधिकार, नीति -निर्देशक तत्व आदि में संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो -तिहाई बहुमत होता है।

अनुच्छेद 368(2) के अंतर्गत किए गए संशोधन का संबंध ‘संघात्मक ढांचे से हैं जिसमें विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों की विधानमंडलों का संकल्प (Resolution) तथा अनु समर्थन (Ratification) होना चाहिए। जैसे -अनुच्छेद 54,55,73, 162,241,भाग 5 के अध्याय 4, भाग 6 के अध्याय 5, अनुसूची 4 तथा अनुच्छेद 368 आदि के विषय में।
संसद ‘प्रस्तावना तथा मूल अधिकारों’ सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है ।परंतु संविधान के आधारभूत ढांचे (Basic structure) में संशोधन नहीं कर सकती।

भारतीय संविधान का निर्माण कब और कैसे हुआ?

उत्तर- कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव के आधार पर भारत के संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया गया था। संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रों (296 सदस्य) एवं देसी रियासतों (93 सदस्य) से किया गया ।

भारतीय संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को संपन्न हुई। डॉ राजेंद्र प्रसाद के अध्यक्ष एवं बी.एन.राव के संवैधानिक सलाहकार नियुक्त होने के पश्चात 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा प्रस्तुत ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ में संविधान की प्रकृति, स्त्रोत, उद्देश्य एवं नागरिकों के लिए संवैधानिक प्रावधानों की रूपरेखा को प्रस्तुत किया गया।

संविधान सभा ने समितियों को दो वर्गों (i)प्रक्रिया संबंधी समिति नियम, परिचालन आदि) तथा (ii) विषय संबंधी समिति (संघ शक्ति, मूल अधिकार, प्रांतीय संविधान आदि) में बांटकर भावी संविधान के लिए ‘प्रारूप निर्माण’ (डॉ. अम्बेडकर) एवं तीन वाचन (विचार-विमर्श) प्रस्तुत किये । 26 नवंबर 1949 को 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियों एवं 22 भाग के साथ संविधान को अंगीकार एवं 26 जनवरी 1950 को लागू (execution)किया गया। डॉ.राजेंद्र प्रसाद को गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति एवं संविधान सभा को ‘अंतरिम संसद में परिवर्तित किया गया।

सर्वप्रथम भारतीय संविधान सभा के गठन की मांग कब की गई?

उत्तर- भारतीयों द्वारा स्वतंत्रता के साथ-साथ संवैधानिक व्यवस्था स्थापना की अनवरत मांग की गई थी। स्वशासन के साथ पूर्ण संवैधानिक उत्तरदायित्व पूर्ण शासन की स्थापना के संबंध में संविधान सभा के लिए निम्न प्रकार से पूर्व प्रयास किए गए
भारत में संविधान सभा के सिद्धांत का दर्शन सर्वप्रथम बाल गंगाधर तिलक के निर्देशन में 1895 के ‘स्वराज विधेयक’ से होता है।गांधीजी ने 1922 में ‘हरिजन’ समाचार पत्र में भारतीयों के लिए संविधान निर्माण के अधिकार की बात कही थी ।1924 में मोतीलाल नेहरू द्वारा ब्रिटिश सरकार के सम्मुख संविधान सभा के निर्माण की मांग प्रस्तुत की गई।
औपचारिक रूप से संविधान सभा के विचार का प्रतिपादन 1934 में समाजवादी विचारक एम.एन.रॉय ने दिया था जिसे कांग्रेस के 1936 के ‘लखनऊ अधिवेशन’ व 1938 में नेहरू जी के ‘वयस्क मताधिकार संबंधी विचार ने मूर्त रूप दिया।
1940 के ‘अगस्त प्रस्ताव’ से संविधान संविधान सभा की मांग को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया गया। वहीं 1942 के ‘क्रिप्स मिशन’ ने इसे स्पष्ट स्वीकार व 1946 के ‘कैबिनेट मिशन’ द्वारा इसे व्यवहारिक रूप प्रदान किया गया।
अतः यह स्पष्ट है कि भारतीयों की संविधान सभा की मांग उस निरंतर चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा थी जिसने अंततः भारत को लोकोपरक, व्यवहारिक संविधान प्रदान किया।